Tuesday, May 21, 2019

Unerwarteter Ärger mit dem Eigenheim

Krach um 600 000 Franken Anschlussgebühren nach BaZ-Recherchen beigelegt – Therwil will Reglement revidieren

Therwil. Es geht um viel Geld, ungenaue Verträge, Reglemente, die willkürlich wirken und am Rande auch um die umstrittene Scientology-Kirche.

Zunächst begann alles in Minne. Die Firma Swiss Immo Trust baute von 2013 bis 2014 an guter Lage in Therwil die schmucke Überbauung Untere Mühle mit 26 Eigentumswohnungen. Doch die Freude an den Eigentumswohnungen verging den Bewohnern in den letzten sechs Monaten – nicht aufgrund der Wohnungen an sich, sondern weil plötzlich Forderungen von insgesamt 600 000 Franken im Raum stehen, mit denen die Stockwerkeigentümer nicht gerechnet haben und die für einige von ihnen kaum aufzubringen sind.

Hickhack um Zahlung
Bei dem Betrag handelt es sich um die Anschlussgebühren an die Kanalisation und Wasserversorgung der Gemeinde Therwil. Für die Stockwerkeigentümer ist klar: Diese Gebühren muss der ehemalige Bauherr Swiss Immo Trust bezahlen, denn die Eigentumswohnungen wurden im Zustand «schlüsselfertig» oder «wie besichtigt» verkauft, was auch ein funktionsfähiges Kanalisationssystem mit einschliesse. Eine Einschätzung, die auf Anfrage der BaZ auch der Advokat und Vizepräsident des Hauseigentümerverbandes Baselland, Alexander Heinzelmann, teilt: «Falls nichts Gegenteiliges im Vertrag oder in zusätzlichen, integrierten Vereinbarungen steht, dürfen die Käufer davon ausgehen, dass die Anschlussgebüren im Kaufpreis inbegriffen sind.»

Die Swiss Immo Trust machte jedoch monatelang keine konkreten Anstalten, die Rechnung der Gemeinde zu übernehmen. Glaubt man Simon von Fürstenhaus*, einem der Eigentümer, macht die Firma im Gegenteil Druck: «Zunächst sagten sie uns, dass sie nicht zahlen. Später hiess es dann, dass sie für einen Deal bereit sind, wenn wir auf unseren Anwalt verzichten. Und zu guter Letzt sind sie zu mir nach Hause gekommen und haben mir angeboten, die Gebühren zu übernehmen, falls ich ihnen ein Darlehen von 200 000 bis 350 000 Franken gebe», sagt von Fürstenhaus.

Die Namen, die von Fürstenhaus in diesem Zusammenhang nennt, sind keine Unbekannten und mit der Scientology-Kirche Basel verbunden. Auch die Swiss Immo Trust taucht auf einer Beobachter-Liste der von aktiven Scientologen geführten Firmen auf. Dies, weil der frühere Verwaltungsrat der Swiss Immo Trust, Rudolf Flösser, leitender Direktor bei Scientology Basel ist. Seine Firma, die Dr. Flösser Treuhand GmbH, hat für das Projekt Untere Mühle auch die Bauherrenberatung übernommen.

«Ich habe an sich nichts gegen Scientology», sagt von Fürstenhaus, der eine Hexenjagd gegen Scientology vermeiden will. Das Verhalten der Swiss Immo Trust in den letzten Monaten findet er trotzdem nicht okay und hat sich deshalb an die BaZ gewandt. Mit Erfolg: Was lange nicht möglich schien, war nach einer Anfrage der BaZ innerhalb eines Tages machbar – die Stockwerkeigentümer haben die schriftliche Bestätigung erhalten, dass Swiss Immo Trust die Gebühren übernimmt.

Christian Varga, Verwaltungsrat der Swiss Immo Trust, bestreitet, dass er die Übernahme der Gebühren je mit der Verleihung eines Darlehens verknüpft hat. Obwohl die Swiss Immo Trust die Gebühren nun übernimmt, ist er nach wie vor der Meinung, dass diese im Preis der Wohnung nicht mit eingeschlossen waren: «Die Kanalisations- und Anschlussbeiträge waren gemäss Vertrag von den Käufern zu tragen. Da jedoch üblicherweise die Kanalisations- und Anschlussbeiträge im Kaufpreis inbegriffen sind, haben wir uns aus Kulanzgründen bereit erklärt, diese Kosten zu übernehmen.» Dies habe er den Käufern im Februar mündlich mitgeteilt: «Wir hätten dies damals schriftlich machen können statt lediglich mündlich, um Klarheit zu schaffen», erklärte Varga.

Unangenehme Situationen
Was Simon von Fürstenhaus fast noch mehr ärgert als das Verhalten von Swiss Immo Trust, ist, dass die Gemeinde die Rechnung, in Kenntnis der Fakten, trotzdem an die Stockwerkeigentümer senden wollte. «Nur aufgrund eines willkürlichen Gummi-Reglements konnte es überhaupt zu dieser unangenehmen Situation kommen.» Das Abwasserreglement der Gemeinde besagt, dass bei Neubauten das Datum der Endschätzung des Gebäudes durch die kantonale Gebäudeversicherung Stichdatum für die Beitragspflicht ist. Auf den Termin der Schätzung haben Gemeinde, Verkäufer und Käufer kaum Einfluss. Im Fall der Unteren Mühle führte dieses Stichdatum dazu, dass die Rechnung trotz schlüsselfertigem Kauf an die Stockwerkeigentümer ging.

«Dieses Reglement ist veraltet, das muss auch die Gemeinde sehen. Sie hätte sich in dieser Angelegenheit auf unsere Seite stellen müssen», sagt von Fürstenhaus enttäuscht.

Laut Gemeindeverwalter Theo Kim muss die Gemeinde die Rechnung dem zum Zeitpunkt der Rechnungsstellung im Grundbuch eingetragenen Eigentümer stellen – ausser der Verkäufer bestätigt der Gemeinde, dass er die Kosten übernimmt, was im Fall von Swiss Immo Trust bisher offenbar nicht der Fall war. Die Schwächen des 25-jährigen Reglements, das ähnlich auch in vielen anderen Gemeinden in Kraft ist, sieht er jedoch auch: «Wir haben bemerkt, dass es in Einzelfällen zu verzwickten und unangenehmen Situationen führen kann.

Es gab auch einen Fall, bei dem Käufer tatsächlich zweimal bezahlen mussten», sagt Kim. Deshalb soll das Reglement noch dieses Jahr revidiert und vor die Gemeindeversammlung gebracht werden: «Darin ist vorgesehen, dass die Rechnung zu einem früheren Zeitpunkt erfolgt, zu dem der Verkäufer im Normalfall noch der Besitzer ist.» Einen Fall wie jenen der Unteren Mühle gäbe es dann nicht mehr.

Wednesday, May 15, 2019

शाह ने कहा- मुझ पर 3 हमले हुए, तृणमूल का उल्टा आरोप- भाजपा वालों ने ही पत्थर फेंके

कोलकाता/नई दिल्ली.  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कोलकाता के रोड शो में हिंसा को लेकर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि हम शांति से रोड शो निकाल रहे थे, लेकिन तीन हमले हुए। हमारे पास खबर थी कि यूनिवर्सिटी से कुछ लोग आएंगे और पथराव करेंगे। अगर सीआरपीएफ न होती तो मेरा बचकर आना नामुमकिन था। दीदी से अपील करता हूं कि अगर कुछ छिपाना नहीं है, तो किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराएं। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि क्या अमित शाह भगवान हैं, जो उनके खिलाफ प्रदर्शन नहीं किया जा सकता।

दोपहर में तृणमूल सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उल्टा आरोप लगाया। उन्होंने कहा, "अमित शाह बंगाल में बाहर के गुंडे लेकर आए। छात्रों ने काले पोस्टर, झंडे दिखाए। यह लोकतांत्रिक विरोध था। भाजपा वालों ने ही पत्थर फेंके। कोलकाता विश्वविद्यालय के छात्र थे, यहां से ईश्वरचंद्र विद्यासागर और श्यामा चरण मुखर्जी जैसी हस्तियों का नाम जुड़ा है।'' ब्रायन ने एक वीडियो दिखाया और कहा कि हम इसे प्रमाणित करते हैं। इसमें साफ दिखाई दे रहा है कि भाजपा के लोगों ने ही पत्थर फेंके। हम यह वीडियो लेकर चुनाव आयोग के पास जाएंगे।

हम कभी मूर्ति खंडित नहीं करते, उसका सम्मान करते हैं- योगी
योगी आदित्यनाथ ने उप्र में एक सभा में कहा- तृणमूल की सरकार जिन्हें आश्रय दे रही है, वही लोग मूर्ति पूजा को नहीं मानते। ईश्वर चंद्र विद्यासागर को हम भी मानते हैं, उनका सम्मान पूरा भारत करता है। हम मूर्ति की स्थापना करते हैं, कभी मूर्ति खंडित नहीं करते हैं। जिन गुंडों को आपने पाला हुआ है, वे जगह-जगह जाकर मूर्ति खंडित करते हैं। अपनी कमियों को छिपाने के लिए आपने ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति खंडित करने का काम किया है।

ममता ने ट्विटर-फेसबुक पर विद्यासागर की डीपी लगाई

ममता बनर्जी और तृणमूल पार्टी के कुछ नेताओं ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स की डीपी बदल ली है। इन सभी ने ट्विटर और फेसबुक पर डीपी के रूप में ईश्वरचंद विद्यासागर की फोटो लगाई है। वहीं, शाह के रोड शो में हिंसा के खिलाफ भाजपा कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में मौन प्रदर्शन किया। इस दौरान केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन, विजय गोयल और जितेंद्र सिंह मौजूद रहे।

मंगलवार रात शाह के रोड शो के दौरान हंगामा हुआ था। अमित शाह जिस वाहन पर सवार थे, उस पर डंडे फेंके गए। रोड शो पर कुछ लोगों ने पत्थर फेंके और आगजनी भी की गई। पुलिस ने हालात काबू में करने के लिए लाठीचार्ज किया। इसके बाद शाह ने रोड शो खत्म कर दिया था।

यूनिवर्सिटी के अंदर से ही पथराव हुआ

शाह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि चुनाव में बंगाल के अलावा कहीं और हिंसा नहीं हुई। ममता बनर्जी का आरोप है कि हिंसा भाजपा कर रही है। भाजपा पूरे देश में चुनाव लड़ रही है जबकि आप सिर्फ बंगाल की 42 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। किसी और राज्य में हिंसा नहीं होती, सिर्फ बंगाल की 6 सीटों पर होती है। कल कोलकाता में पुलिस और चुनाव आयोग मूकदर्शक बना रहा। प्रधानमंत्री, मेरे और नेताओं के पोस्टर फाड़े गए। आगजनी, पथराव और बोतल में केरोसीन डालकर सुलगाने की कोशिश हुई। यूनिवर्सिटी के अंदर से पत्थरबाजी अंदर से हो रही थी।

तृणमूल कार्यकर्ताओं ने विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी: शाह

शाह ने कहा कि यूनिवर्सिटी के अंदर जाकर ईश्वरचंद विद्यासागर जी की मूर्ति को किसने तोड़ा। अदंर से तो टीएमसी के कार्यकर्ता पत्थरबाजी कर रहे थे। वे ही डंडे लेकर बाहर आ रहे थे। भाजपा कार्यकर्ता तो बाहर थे। बीच में पुलिस थी। टीएमसी कार्यकर्ताओं ने वोट बैंक की राजनीति के लिए शिक्षाशास्त्री की प्रतिमा तोड़ी। मुझे लगता है ममता सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। मुझ पर बंगाल में एफआईआर दर्ज की गई। मैं बताना चाहता हूं कि आपसे डरता नहीं हूं।

ममता ने भाजपा पर मूर्ति तोड़ने का आरोप लगाया

ममता ने कहा, ‘‘वे (भाजपा) असंस्कारी हैं, इसलिए उन्होंने विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी। वे बाहरी हैं। क्या शाह कलकत्ता विश्वविद्यालय की विरासत के बारे में जानते हैं? क्या वे जानते हैं कि कौन सी महान हस्तियों ने यहां पढ़ाई की? इस तरह के हमले के लिए उन्हें शर्म आनी चाहिए।’’

Thursday, April 25, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: क्या है पाकिस्तान से आए हिंदुओं का हाल

पड़ोस से पनाह की गुहार लेकर आए वो पाकिस्तानी हिंदू अभिभूत हैं जिन्हें भारत की नागरिकता मिल गई.

वो इन चुनावों में वोट डाल सकेंगे. लेकिन ऐसे हज़ारों लोग हैं जो अब भी अनिश्चितता के अंधेरे में जी रहे हैं. इन हिंदुओं का मुद्दा एक बार फिर सतह पर आ गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी दो चुनावी सभाओं में इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा है.

उधर कांग्रेस कहती है कि बीजेपी सरकार ने इन शरणार्थियों को उनके भाग्य पर छोड़ दिया और पांच साल तक कुछ नहीं किया.

पाकिस्तान से आए हिंदुओं के लिए आवाज़ उठाने वाले सीमान्त लोक संगठन के अनुसार राजस्थान में ऐसे 35 हज़ार लोग हैं जो भारत की नागरिकता के लिए कतार में लगे हैं.

पिछले पांच साल में कुछ सैकड़ों लोगों को ही भारत की नागरिकता मिल सकी है. इनमे डॉक्टर राजकुमार भील भी हैं.

पाकिस्तान के सिंध सूबे से आए डॉक्टर भील को नागरिकता के लिए 16 साल इंतज़ार करना पड़ा. अब वो भारत के मतदाता हैं. यह कितनी बड़ी ख़ुशी है?

डॉ. भील कहते हैं, "इसे बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. यूं मानिए कि मेरे पैर ज़मीन पर नहीं है. यह मेरे लिए दिवाली से बड़ी ख़ुशी है क्योंकि दिवाली तो साल में एक बार आती है. मगर इस ख़ुशी की रौशनी तो 16 साल बाद आई है."

चेतन दास कभी पाकिस्तान में शिक्षक थे लेकिन अब वो भारत के नागरिक हैं. उन्हें कुछ माह पहले ही भारत की नागरिकता मिली है.

चेतन बताते हैं, "हम परिवार में 12 लोग हैं. उनमें से सिर्फ़ मुझे ही नागरिकता मिली है. इसके लिए 19 साल इंतज़ार करना पड़ा."

वो कहते हैं, "उम्र ढल गई है. मुझे मेरे बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही है. मेरी बेटी ने यहां बीटेक तक पढ़ाई की थी. मगर जब भी रोज़गार की बात आती थी, लोग नागरिकता के क़ागज़ मांगते थे. इन सबसे वो इस कदर मायूस हुई कि ख़ुदकशी कर ली.''

सीमान्त लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढा कहते हैं, "कोई दो साल पहले सरकार ने नागरिकता के लिए ज़िला अधिकारियों को अधिकार दिए मगर इसमें बहुत धीमी प्रगति हुई. अभी 35 हज़ार लोग हैं, जो नागरिकता के लिए गुहार लगा रहे हैं. पर इनमें से सिर्फ़ एक हज़ार को ही नागरिकता मिल सकी है. लोग भविष्यहीनता के दर्द और डर में जी रहे है. इस बेबसी का फ़ायदा उठाकर सरकारी महकमों में दलालों का एक गिरोह सक्रिय हो गया है. ये लोग वसूली करते हैं और वापस भेजने की धमकी देते हैं."

वो बताते हैं कि ऐसा ही एक गिरोह दो साल पहले पकड़ा गया था. इसमें केंद्र सरकार का एक कर्मचारी भी शामिल था.

नागरिकता से महरूम पाकिस्तान के इन हिंदुओं का एक बड़ा हिस्सा जोधपुर में आबाद है. कुछ बीकानेर, जालोर और हरियाणा में शरण लिए हुए हैं.

इन्ही में से एक महेंद्र कहते हैं, "दो दशक से ज़्यादा वक्त गुज़र गया लेकिन अब भी उन्हें नागरिकता नहीं मिली है. लोग उन्हें जब पाकिस्तानी कहकर सम्बोधित करते हैं तो बुरा लगता है. हमारे बच्चे यहीं पैदा हुए मगर उन्हें भी पाकिस्तानी कहा जाता है."

पूर्णदास मेघवाल पहले पाकिस्तान के रहीमयारखां जिले में रहते थे. अब पिछले 20 साल से भारत में रह रहे हैं. वो कहते हैं कि उन्हें अब तक हिंदुस्तान की नागरिकता नहीं मिली. मेघवाल पहले कभी पाकिस्तान में वोट डालते थे.

मगर वो कहते है वहां चुनाव का कोई मतलब नहीं था. उन्हें उम्मीद है कि कभी वो घड़ी भी आएगी जब उन्हें भारत में वोट डालने का हक मिलेगा.

पाकिस्तान से आए ये लोग उस मंज़र को याद कर अब भी सहम जाते हैं जब वर्ष 2017 में पुलिस ने चंदू भील और उनके परिवार के नौ सदस्यों को वापस पाकिस्तान भेज दिया था.

सीमान्त लोक संगठन ने उस भील परिवार को भारत में बने रहने के लिए हाई कोर्ट में याचिका भी दायर की और कोर्ट ने उस पर स्थगन आदेश भी जारी कर दिया. मगर पुलिस तब तक चंदू और उसके परिवार को थार एक्सप्रेस से रवाना कर चुकी थी.

चेतन कहते हैं सरकार को यह सोचना चाहिए था कि उन पर वहां क्या गुज़रेगी. अगर वहां सब कुछ ठीक होता तो लोग यहाँ क्यों आते?

वो कहते हैं, ''किसी के लिए कितना मुश्किल होता है अपना पुश्तैनी गांव-घर सदा के लिए छोड़ देना.''

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बाड़मेर और जोधपुर की चुनाव सभाओं में इस मुद्दे को उठाया और कहा वो इन हिंदुओं की नागरिकता के लिए प्रयास करेंगे.

मोदी ने कहा कांग्रेस सरकार ने इन हिंदुओं की अनदेखी की है.

मगर राज्य कांग्रेस में महासचिव पंकज मेहता कहते हैं, "प्रधानमंत्री ने बिलकुल निराधार बात कही है. उन्हें पता होगा कि उनकी सरकार के दौरान ही चंदू भील और उनके परिवार को जबरन पाकिस्तान वापस भेज दिया गया. कांग्रेस ने कभी किसी को ऐसे वापस नहीं धकेला."

मेहता कहते हैं, "बीजेपी सरकार ने इन निरीह लोगों को दलालों के भरोसे छोड़ दिया. इसमें सरकारी कर्मचारी भी शामिल थे. अब चुनाव आने पर बीजेपी को इन शरणार्थियों की याद आने लगी है."

इससे पहले वर्ष 2004-05 में राजस्थान में कोई 13 हज़ार पाकिस्तानी हिंदुओं को भारत की नागरिकता दी गई थी. इनमे अधिकांश या तो दलित हैं या फिर आदिवासी भील समुदाय के.

Thursday, April 11, 2019

इलेक्टोरल बॉन्ड के खिलाफ़ नहीं पर चंदा देने वाले की पहचान ज़ाहिर हो: चुनाव आयोग

इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए राजनीतिक पार्टिर्यों को मिलने वाले चंदे पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वो इस तरह की फंडिंग के ख़िलाफ़ नहीं है पर चंदा देने वाले शख़्स की पहचान अज्ञात रहने के ख़िलाफ़ है.

चुनाव आयोग के नरमी भरे बर्ताव पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि आपने मई 2017 में केंद्र को लिखी अपनी चिट्ठी में इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े नियमों को 'पीछे ले जाने वाला क़दम' बताया था. क्या आपने अपना पक्ष बदल लिया है?

मई 2017 में आयोग ने एक चिट्ठी लिखी थी जिसके मुताबिक़ चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टिर्यों को दिए जाने वाले चंदे को सार्वजनिक ना करने पर आपत्ति दर्ज की थी.

केंद्र सरकार का तर्क है कि वह चंदा देने वाले व्यक्ति की पहचान को लेकर गोपनीयता रखना चाहती है.

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी गुरुवार को रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से अपना नामांकन भरेंगी. नामांकन भरने से पहले वो एक रोड शो भी करेंगी.

दोपहर 12 बजे से ये रोड शो शुरू होगा और हाथी पार्क, कचहरी से होकर कलेक्ट्रेट दफ़्तर तक पहुंचेगा जहां सोनिया गांधी अपना नामांकन दाख़िल करेंगी.

रायबरेली में पाँचवें चरण यानी 6 मई को मतदान होंगे. कांग्रेस का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट से सोनिया गांधी पाँचवीं बार चुनावी मैदान में हैं.

गुरुवार को वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी की. यह गैलैक्सी में लगभग 4000 करोड़ में फैला हुआ है और आकार में पृथ्वी से तीस लाख गुना बड़ा है. ये तस्वीर इवेंट हॉरिजन टेलिस्कोप से ली गई है जो आठ टेलिस्कोप का एक नेटवर्क है.

इस प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर हेनियो फ़ैलेक ने बीबीसी को बताया कि ब्लैक होल एम87 गैलेक्सी में पाया गया है.

ये हमारे सोलर सिस्टम से भी बड़ा है और वज़न में सूर्य से 650 करोड़ से ज़्यादा है. ये ब्रह्मांड में मौजूद सबसे बड़ा ब्लैक होल है.

ब्रेक्ज़िट के लिए 31 अक्टूबर तक की मोहलत

ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने आपसी सहमति से ब्रेक्ज़िट की नई अंतिम तारीख़ 31 अक्टूबर तय की है.

ब्रसेल्स में ईयू समिट के दौरान चली पांच घंटे की बैठक के बाद ये आम सहमति बन पायी है. ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने कहा है कि ब्रिटेन जल्द से जल्द यूरोपीय संघ से अलग होने की तैयारियों में जुटा है.

वहीं, यूरोपीय काउंसिल के प्रमुख डॉनल्ड टस्क ने कहा है कि मैं ब्रिटेन से अपील करना चाहता हूं कि इस बार दिए गए समय को व्यर्थ ना करें.

बिन्यामिन नेतन्याहू का पाँचवीं बार इसराइल का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय है. उनके प्रतिद्वंद्वी बेनी गंट्ज़ ने बुधवार को हार स्वीकार कर ली.

गंट्ज़ ने कहा कि भले ही वो ये चुनाव नहीं जीत पाए लेकिन विपक्ष में रहते हुए वो नेतन्याहू से कड़े सवाल करते रहेंगे. वोटों की गिनती लगभग पूरी हो चुकी है और गंट्ज़ ने नेतन्याहू को कड़ी टक्कर दी है.

इसके बावजूद संसद की 120 सीटों में नेतन्याहू की पार्टी लिकूड और दक्षिणपंथी गठबंधन 65 सीटों के साथ सबसे बड़ा ब्लॉक बनकर उभरा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर उन्हें बधाई देते हुए लिखा है, 'मेरे प्रिय मित्र 'बीबी' आपको बधाई. आप भारत के क़रीबी मित्र हैं और मैं आपके साथ दोनों देशों के द्विपक्षीय गठजोड़ को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए उत्सुक हूं. ''

Tuesday, April 2, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: कांग्रेस मेनिफेस्टो की पाँच बड़ी बातें

लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र कांग्रेस पार्टी ने मंगलवार को वादों से भरा चुनावी घोषणा पत्र यानी मेनिफेस्टो जारी किया.

'हम निभाएंगे' नाम के इस घोषणापत्र में कई बड़े वायदे किए गए हैं और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दावा किया कि इसमें कोई वादा झूठ पर आधारित नहीं है.

इनमें से पांच अहम वादे क्या हैं, पढ़िए -

पहला वादा- कांग्रेस के मेनिफेस्टो में पहला वादा है रोज़गार का.

घोषणा पत्र में 2020 तक सभी खाली सरकारी पदों को भरने का वादा किया गया है. ग्रामीण युवाओं को रोज़गार देने का वादा मेनिफेस्टो में किया गया है. राहुल गांधी ने कहा कि उनकी सरकार पंचायतों और स्थानीय निकायों में 10 लाख सेवा मित्रों की नियुक्ति के साथ-साथ सरकारी परीक्षाओं और सरकारी पदों के लिए होने वाली परीक्षा से आवेदन शुल्क हटाने का वादा किया है.

इसके साथ ही तीन साल के लिए युवाओं को बिज़नेस खोलने के लिए कोई मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं होगी और बैंक के दरवाज़े उनके लिए खोल दिए जाएंगे.

दूसरा वादा- मेनिफेस्टो में दूसरा अहम मुद्दा किसानों और कृषि से जुड़ा है. राहुल गांधी ने कहा है कि वो कृषि क्षेत्र का महत्व समझते हुए रेलवे की तरह अलग से किसान बजट पेश करेंगे.

कांग्रेस का कहना है कि केवल कृषि कर्ज़ माफ़ ही नहीं करेंगे बल्कि उचित मूल्य, कम लागत, बैंकों से कर्ज़ की सुविधा दे कर किसानों को अधिक आत्मनिर्भर बनाएंगे.

हर ब्लॉक में आधुनिक गोदाम और कोल्ड स्टोर बनाने के लिए नीति बनाने की बात और जैविक खेती को बढ़ावा देने की बात भी मेनिफेस्टो में की गई है.

मनरेगा को एक बार फिर नए सिरे से प्रारूप देने (मनरेगा-3.0 का आरंभ करने) का काम करने का वादा भी किया गया है ताकि जिन ज़िलों ने 100 दिन के रोज़गार के लक्ष्य को पूरा किया गया है वहां रोज़गार गारंटी बढ़ाकर 150 किया जाएगा और जलाशयों की मरम्मत किया जाएगा. साथ ही स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूलों में कक्षा और पुस्तकालय और खेल के मैदानों के लिए भी मनरेगा के तहत काम होगा.

किसानों के कर्ज़ की समस्या से निपटने के लिए राहुल गांधी ने कहा कि डिफॉल्ट होने पर किसानों पर आपराधिक मामले दायर नहीं किए जाएंगे.

उन्होंने कहा कि अगर किसान कर्ज़ न दे पाए तो वो आपराधिक मामला नहीं बल्कि उसे सिविल ऑफेंस माना जाएगा.

अपने मेनिफेस्टो में कांग्रेस ने बेघरों तथा भूमिहीन (जिसके पास घर बनाने की भूमि न हो) को घर देने के लिए "वासभूमि का अधिकार" कानून (Right to Homestead Act) बनाने का भी वादा किया है.

तीसरा वादा- अगला अहम वादा न्यूनतम आय योजना का है. कांग्रेस का कहना है कि गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य को पूरा करने के लिए ये योजना लाई जाएगी.

राहुल गांधी ने कहा है कि इसके तहत जनसंख्या का 20 प्रतिशत (5 करोड़ के आसपास) गरीब परिवारों को इसका लाभ मिलेगा. इसके तहत हर परिवार को सालाना 72,000 और पांच साल में 3,60,000 रुपये डाले जाएंगे.

उन्होंने नारा दिया- 'ग़रीबी पर वार 72 हज़ार' और कहा कि 'हमारा पहला कदम न्याय का कदम है.'

राहुल गांधी का कहना है कि इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा और इसकी अनुमानित लागत पहले साल में में जीडीपी का 1 फ़ीसदी से कम तथा उसके बाद जीडीपी के 2 फ़ीसदी से कम रहने की उम्मीद है.

चौथा वादा- कांग्रेस ने देश में रेलवे के पुराने ढांचे को व्यापक रूप से और आधुनिक बनाने, राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण को तेज़ी से बढ़ाने और पूर्वोत्तर राज्यों में भी सड़क और रेल मार्ग को बेहतर करने का वादा किया है.

कांग्रेस ने पूर्वोत्तर राज्यों को विशेष दर्जा देने का वादा किया है और कहा है कि वो इन राज्यों के लिए औद्योगिक नीति लाएगी.

साथ ही शहरीकरण पर एक व्यापक नीति बनाने का भी वादा किया गया है जिसे बनाने में आपदा प्रबन्धन, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण का ध्यान रखा जाएगा.

शहरों में बढ़ रहे झुग्गियों में पानी, बिजली और स्वच्छता की व्यवस्था के लिए झुग्गी-झोपड़ी विकास एवं सुधार कार्यक्रम शुरू करने का वादा किया गया है.

कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में उद्योगों के साथ मिलकर विज्ञान और प्रोद्योगिकी पर जीडीपी का 2 फ़ीसदी तक खर्च करने और मत्स्य उद्योग और मछुआरों के कल्याण के लिए एक अलग मंत्रालय बनाने का वादा किया है.

पांचवा वादा- स्वास्थ्य को लेकर राहुल गांधी ने कहा कि हम प्राइवेट इंश्योरेंस आधारित स्वास्थ्य स्कीमों पर भरोसा नहीं करते.

उन्होंने मोदी सरकार की स्वास्थ्य स्कीमों पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार ने लोगों से ही पैसा लेकर कुछ चंद लोगों को देने का काम किया है. हम सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने का काम करेंगे.

महिलाओं के लिए वादे- न्याय योजना के तहत दिए जाने वाले पैसे को महिलाओं के खाते में डालने की बात कांग्रेस ने की है.

साथ ही कांग्रेस ने कहा है कि 17वीं, लोकसभा के पहले सत्र में और राज्य सभा में संविधान संशोधन विधेयक के ज़रिए वो लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान करेगी. साथ ही हम केन्द्र सरकार की नौकरियों में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान करेंगे.

साथ ही सीआईएसएफ़, सीआरपीएफ़ और बीएसएफ़ जैसी सशस्त्र बलों में महिलाओं की संख्या बढ़ाकर 33 फ़ीसदी करने का वायदा किया गया है. ये भी कहा गया है कि राज्य पुलिस बल में पदोन्नति में महिलाओं के 33 फ़ीसदी आरक्षण के मापदण्ड का सम्मान किया जाएगा.

कांग्रेस ने कहा है कि उनकी सरकार में कस्बों और शहरों में सरकारी नौकरी और नगरपालिका की नौकरी में अधिक महिलाओं को भर्ती किया जायेगा.

कांग्रेस ने राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को दूसरे आयोगों की तर्ज पर संवैधानिक दर्ज़ा देने की बात की है.

Thursday, March 21, 2019

न्यूज़ीलैंड में सेमी-ऑटोमैटिक हथियार रखने पर लगी पाबंदी

न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने कहा है कि क्राइस्टचर्च की मस्जिदों पर हुए हमले में जिन सेमी-ऑटोमैटिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया है उन पर पाबंदी लगेगी.

बीते शुक्रवार को दो मस्जिदों में हमला कर एक बंदूकधारी ने 50 लोगों की हत्या कर दी थी. इसके बाद से न्यूज़ीलैंड में बंदूक ख़रीदने और रखने के नियमों पर बहस हो रही थी.

उन्होंने कहा अभी जिनके पास ये हथियार हैं उन मालिकों से इसे वापस लेने के लिए एक औपचारिक नियम बनाया जाएगा.

अर्डर्न ने कहा, "इस हमले के छह दिन बाद, हम न्यूजीलैंड में सभी सेमी-ऑटोमैटिक (एमएसएसए) और असॉल्ट राइफलों पर प्रतिबंध की घोषणा कर रहे हैं."

"इन बंदूकों को एमएसएसए में बदलने के लिए उपयोग किए जाने वाले संबंधित पार्ट्स और सभी उच्च क्षमता वाली गोलियों पर भी प्रतिबंध लगाया जा रहा है."

अर्डर्न ने बताया कि अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक़ इन हथियारों को वापस ख़रीदने में क़रीब 100 से 200 मिलियन डॉलर का खर्च आएगा. लेकिन हमें अपने समुदाय को सुरक्षित रखने के लिए यह क़ीमत ज़रूर चुकानी चाहिए."

एआर-15 समेत सेमी-ऑटोमैटिक राइफलों से लैस अकेले बंदूकधारी ने बीते शुक्रवार को मस्जिद में गोलीबारी में कई लोगों की जानें ले ली थीं. माना जा रहा है कि उसने अपने हथियार में उच्च क्षमता वाली मैगज़ीन के लिए ख़ास बदलाव किया था.

इस नए नियम से हथियार मालिकों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर अर्डर्न ने कहा कि उन्हें पता है, "आप में अधिकतर लोगों ने क़ानून के दायरे में ये हथियार लिए होंगे. कीट नियंत्रण, पशु कल्याण समेत 0.22 कैलिबर राइफल और छोटे बंदूक जिनका बत्तख के शिकार में इस्तेमाल किया जाता है उन्हें इस नए नियम के दायरे से बाहर रखा जाएगा."

उन्होंने कहा, "मैं विश्वास करती हूं कि न्यूज़ीलैंड के अधिकतर बंदूक मालिकों को समझ में आ जाएगा कि ये क़दम राष्ट्र हित में उठाया गया है."

न्यूज़ीलैंड के गृह मंत्री स्टुअर्ट नैश ने कहा, "मैं याद दिलाना चाहता हूं कि बंदूक रखना न्यूज़ीलैंड में एक विशेषाधिकार है न कि निजी अधिकार."

न्यूज़ीलैंड में बंदूक रखने के क़ानून के तहत, ए कैटेगरी के हथियार सेमी-ऑटोमेटिक हो सकते हैं जिनमें एक बार में सात गोलियां भरी जा सकती हैं. एक अनुमान के अनुसार देश में इस समय कुल 15 लाख हथियार हैं.

जैसा कि अर्डर्न ने कहा कि जब अप्रैल के पहले हफ़्ते में संसद की बैठक होगी तब इस प्रतिबंध के लिए क़ानून लाया जाएगा.

उन्होंने कहा है कि क़ानून के तकनीकी पहलुओं पर प्रतिक्रिया के लिए एक 'सेलेक्ट कमेटी' गठित की जाएगी और संसद के इसी सत्र के दौरान हथियार रखने के नियमों में बदलाव किए जाने चाहिए.

क़ानून बनने के बाद जब एक बार इन हथियारों को वापस किए जाने की तय सीमा समाप्त हो जाएगी और किसी के पास ये हथियार पाए जाते हैं तब उसे चार हज़ार डॉलर जुर्माना भरने के साथ ही तीन साल की जेल की सज़ा का सामना करना पड़ेगा.

वैसे तो क्राइस्टचर्च हमले के बाद सेमी ऑटोमेटिक हथियारों पर बैन की मांग बढ़ गई है. लेकिन पहले भी न्यूज़ीलैंड में क़ानून का शिंकजा कसने की कोशिश हुई थी लेकिन बंदूकों का समर्थक करने वाले वर्ग के तीखे विरोध के चलते ये प्रयास असफल हो गए.

ग़ौरलतब है कि न्यूज़ीलैंड में बंदूक रखने की न्यूनतम उम्र 16 साल और मिलिट्री स्टाइल सेमी-ऑटोमैटिक हथियारों को रखने के लिए न्यूनतम उम्र 18 साल है. बंदूक रखने के लिए यहां लाइसेंस होना ज़रूरी है.

हालांकि, न्यूज़ीलैंड की पुलिस ये जांच करती है कि बंदूक के लिए आवेदन करने वाला व्यक्ति नियमों पर खरा उतरता है या नहीं. उदाहरण के लिए, लाइसेंस देने से पहले आपराधिक और मेडिकल रिकॉर्ड की छानबीन की जाती है.

Thursday, March 7, 2019

Führende Scientologen gehören zu den aktivsten Immobilienplayern der Stadt

Die Scientology-nahe Swiss Immo Trust AG aus Kaiseraugst ist eine wichtige Akteurin auf dem Basler Immobilienmarkt. Dabei geht die Firma nicht gerade zimperlich vor.

Ein Firmengeflecht rund um die Swiss Immo Trust AG in Kaiseraugst war massgeblich an der Finanzierung der Scientology-Zentrale am Rande Basels beteiligt. Recherchen der TagesWoche zeigten, wie führende Personen in diesen Firmen mit ihren namhaften Spenden einen Grossteil des Sektentempels an der Burgfelderstrasse finanzierten.

Doch nicht nur innerhalb des Basler Ablegers von Scientology ist dieses Unternehmen eine relevante Grösse. Wie unsere Datenauswertung zeigt, gehört die Swiss Immo Trust zu den wichtigsten Akteuren im Geschäft der Umwandlung von Mietwohnungen in Stockwerkeigentum.

Die TagesWoche hat die im Kantonsblatt publizierten Handänderungen auf dem Basler Immobilienmarkt seit Mitte 2008 ausgewertet. Eine solche Transaktion beschreibt den Verkauf einer Immobilie. Naturgemäss geschieht dies bei der Umwandlung in Stockwerkeigentum in relativ kurzer Zeit gleich mehrfach. Ein Unternehmen kauft eine Liegenschaft auf, renoviert oder baut neu und bringt die Wohnungen daraufhin einzeln auf den Markt. Statt einem einzelnen Eigentümer gibt es nun viele verschiedene.

Umstrittenes Business
Dieses Business gilt deshalb als umstritten, weil dadurch sehr oft günstiger Wohnraum verloren geht. Bevor die Umwandlung in Wohneigentum möglich ist, müssen die bisherigen Mieter nämlich weichen.

Zwischen 2010 und 2014 war die Swiss Immo Trust an über 50 solcher Handänderungen beteiligt. Bei 43 davon ging es um Stockwerkeigentum, verteilt auf insgesamt fünf Bauprojekte. Die Liegenschaften befinden sich allesamt im Gebiet zwischen Schützenmatt- und Kannenfeldpark. Bei all diesen Projekten immer mit dabei: Rudolf Flösser, leitender Direktor von Scientology Basel.

Grösstes Projekt war die Überbauung zwischen der Türkheimerstrasse und dem Spalenring. Dort kaufte die Swiss Immo Trust zwei ältere Liegenschaften auf, um sie durch einen Neubau mit 21 Eigentumswohnungen zu ersetzen.

Das Projekt an der Türkheimerstrasse wurde von der
BW-Liegenschaftsverwaltung geleitet, die sich ebenfalls in den Händen einer Scientologin befindet.

Dies Leitung dieses Projekts oblag der BW-Liegenschaftsverwaltung GmbH, einer Firma von Brigitte Widmer – Scientologin und potente Spenderin für den Bau der Sektenzentrale. Die Wohnungen waren zuvor sehr günstig, eine 3-Zimmer-Wohnung kostete weniger als 1000 Franken.

Das Geschäft ging nicht reibungslos über die Bühne, weil sich einige der verbliebenen Mieter gegen ihre Kündigungen wehrten. Darunter zwei Gewerbler, eine Druckerei und ein Malergeschäft. Diese suchten Hilfe beim Mieterverband und erhoben Einsprache.

Eine erste Kündigung, ausgesprochen durch die Firma BW-Immobilientreuhand, ebenfalls aus dem Umkreis der Scientology, erfolgte zur Unzeit und wurde deshalb für ungültig erklärt. Das Bauprojekt in seiner ersten Version (hauptsächlich 1- und 2-Zimmer-Wohnungen) hielt der gerichtlichen Prüfung ebenso wenig stand und wurde für untauglich befunden. Die Mieter durften ein Jahr länger bleiben.

Nachträgliche Kosten
Unangenehm aufgefallen ist die Swiss Immo Trust auch auf dem Land. 2008 berichtete etwa der «Blick» von einer Überbauung in Therwil. Dort wurde sämtlichen 28 Mietparteien wegen Sanierungsbedarf gekündigt – ihre Wohnungen wurden danach während der Euro 08 aber für mehr als 400 Franken pro Tag an Fussballfans zwischenvermietet.

In einem anderen Fall in Oberwil kam es zwischen dem Unternehmen und
26 Käuferparteien von Eigentumswohnungen zu einem Streit wegen einer Rechnung von 600’000 Franken. Die Swiss Immo Trust wollte diese Anschlussgebühr für Wasser und Kanalisation nachträglich auf die Käufer überwälzen.

Diese gingen jedoch davon aus, dass diese Gebühren bereits im Kaufpreis enthalten gewesen waren. Erst nachdem wiederum die BaZ recherchiert hatte, zeigte sich die Swiss Immo Trust einsichtig und verzichtete auf die Forderung.